जीन पियाजे का नैतिक विकास सिद्धान्त ( Jean Piaget's theory of moral development )



जीन पियाजे (1896-1980) एक स्विट्जरलैंड के मनोविज्ञानिक थे तथा मूलरूप से वे प्राणी विज्ञान (zoology) के विद्वान थे |


जीन पियाजे  के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त:-


जीन पियाजे ने बालकों के संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाएं बतायीं हैं -

  • संवेदी - पेशीय ( Sensorimotor stage)
  • पूर्व संक्रियात्मक अवस्था ( Preoperational stage)
  • मूर्त संक्रियात्मक की अवस्था ( Concrete operational stage)
  • औपचारिक संक्रिया की अवस्था ( Formal operational stage)


1. संवेदी पेशीय अवस्था / इंद्रिय जनित गामक अवस्था (Sensorimotor stage):- (0 से 2 वर्ष ) 

  • 0 से 1 माह-  इस अवस्था में शिशु चूसना, रोना तथा अन्य समस्त शारीरिक क्रियायें करने लगता   है।
  • 1 से 4 माह-  इस अवस्था में शिशु प्राथमिक क्रियाओं का सम्पादन करना सीखता है। यहीं से वह आत्मीयकरण तथा संधानीकरण में अन्तर करना प्रारंभ कर देता है।
  • 4 से 8 माह-  इस अवस्था में शिशु के कार्यों में उद्देश्यपूर्णता आती जाती है।
  • 8 से 12 माह- इस अवस्था में आकर शिशु प्राथमिक तथा अन्य क्रियाओं में समन्वय स्थापित करने लगता है तथा अपने उद्देश्य की प्राप्ति में आई बाधाओं को भी दूर करना सीखता है|
  • 12 से 18 माह- इस अवस्था में आकर शिशु साधन एवं साध्य में अन्तर करना तथा उपयुक्त साधनों का प्रयोग कर साध्यों को प्राप्त करना सीखता है।
  • 18 से 24 माह- इस अवस्था में आकर शिशु अपनी मानसिक शक्तियों के प्रयोग से साधनों की प्राप्ति हेतु नवीन साधनों का चयन एवं प्रयोग करना सीखता है|

2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था ( Preoperational stage ):-  ( 2 से 7 वर्ष )

  • इस अवस्था में बालक में भाषायीक,सामाजिक तथा आत्मकेंद्रितता के गुण विकसित होते हैं।
  • बालक में नकल करने की प्रवृत्ति जाती है। 
  • बालक में शब्दों के प्रति समझ उत्पन्न हो जाती है।
  • बालक में वस्तु तथा उसके महत्व को समझने तथा शब्दों में अंतर स्पष्ट करने की भावना प्रकट हो जाती है तथा चिन्हों एवं प्रतीकों में अंतर स्पष्ट करने लगते हैं।

3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था ( Concrete operational stage):- ( 7 से 11 वर्ष )

  • बालक के अंदर चिंतन, तर्क करने का विकास प्रारंभ हो जाता है।
  • बालक अनेक तार्किक रूप से क्रियाओं को करने में सक्षम हो जाता है।
  • बालक के विचार प्रौढ़ ( बड़े लोगों ) के विचारों के काफी निकट होते हैं।
  • बालक में पहचानने ,अंतर करने तथा वर्गीकरण करने के गुण पाए जाते हैं।

4. अमूर्त / औपचारिक संक्रियात्मक की अवस्था ( Formal operational stage):- (11 से 15 वर्ष )

  • इस अवस्था में बालक मूर्त चिंतन के साथ-साथ अमूर्त चिंतन भी करने लगते हैं। 

अमूर्त का अर्थ है- प्रेम,सहानुभूति, न्याय,स्वतंत्रता आदि अर्थात जिसको महसूस किया जा सके।

  • बालक में समझने सोचने-समझने, समस्या समाधान करने एवं निर्णय लेने की क्षमता का विकास हो जाता है।


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निष्कर्ष Conclusion –

 

जीन पियाजे (Jean Piaget's Theory) ने अपने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त पर बालक के क्रमबद्ध विकास के सम्बंध में विस्तारपूर्वक टिप्पणी की हैं। जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास के द्वारा हम बालक की मनोस्थिति को समझ सकते हैं। इस सिद्धान्त के द्वारा हम छात्रों के मानसिक विकास में वृद्धि कर सकतें हैं शिक्षण नीति के निर्माण में जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास एक बड़ी भूमिका निभाता हैं पर जब तक इसका क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं होगा। तब तक शायद ही बच्चे का मानसिक विकास अच्छे से हो पाए। इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षक की गुणवत्ता में वृद्धि की जाए क्योंकि एक शिक्षक ही बालक के सर्वांगीण विकास में उसकी सहायता कर सकता है।

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